श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्
एकोनत्रिंश सर्गः
सीता का श्रीराम के समक्ष उनके साथ अपने वनगमन का औचित्य बताना
श्रीराम की बात सुनी जब, सीता दुःख से हुईं आकुल
धीरे-धीरे कहे वचन ये, अश्रु बहातीं, था अंतर व्याकुल
प्राणनाथ ! यह बात जान लें, जो-जो दोष बताये वन के
गुण रूप वे हो जायेंगे, स्नेह आपका पाकर सारे
रघुनन्दन ! मृग, सिंह आदि, वन प्राणी भाग जायेंगे
देख आपका रूप अनोखा, होकर फिर भयभीत आपसे
निश्चय ही मुझे जाना वन, गुरूजनों की ले आज्ञा
प्राण शेष ये नहीं रहेंगे, हुआ यदि वियोग आपका
देवराज भी साथ आपके, नहीं अनादर कर सकते हैं
पतिव्रता सह सके वियोग न, यही आप भी कहते हैं
यद्यपि वन में दोष व दुःख हैं, किन्तु यह नियति है मेरी
पिता के घर यह बात सुन चुकी, सत्य विधि यह होके रहेगी
वन जाकर भोग लूँगी वह, भाग्य विधान जो लिखा हुआ
पिता के घर पर सुनी बात यह, एक भिक्षुकी ने कहा था
पहले भी की थी प्रार्थना, कुछ काल तक वनवास की
राजी हुए आप थे इस हित, इच्छा थी यह मेरे मन की
रघुनन्दन ! हो भला आपका, सेवा मैं आपकी करूंगी
आपके पीछे वन जाने से, पाप से हो मुक्त रहूंगी
अनुरागमन आपका करके, परलोक में हो कल्याण
साथ आपका बना रहेगा, स्वामी-देवता मेरे आप
सुख-दुःख में मैं सम रहूंगी, हर्ष-शोक दोनों से ऊपर
वश में नहीं मन-इन्द्रियां, दुःख से वे ही होते कातर
यदि मुझे ले गये साथ न, जीवित नहीं रहूंगी मैं
अश्रु बहाते होते पीड़ित, इस प्रकार विनती की उनसे
चिंतित और दुखी देखकर, श्रीराम ने फिर समझाया
किन्तु और भी व्याकुल होकर, सीता ने अधिक दुःख पाया
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में उनतीसवाँ
सर्ग पूरा हुआ.
आपने लिखा...
ReplyDeleteकुछ लोगों ने ही पढ़ा...
हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 04/03/2016 को पांच लिंकों का आनंद के
अंक 231 पर लिंक की गयी है.... आप भी आयेगा.... प्रस्तुति पर टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।
स्वागत व आभार कुलदीप जी
ReplyDeleteबहुत सुन्दर प्रसंग ...
ReplyDelete