Monday, January 7, 2013

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम् पंचदशः सर्गः


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 


पंचदशः सर्गः

ऋष्यश्रंग द्वारा राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ, देवताओं की प्रार्थना से ब्रह्माजी का रावण के वध का उपाय ढूँढ निकलना तथा भगवान विष्णु का देवताओं को आश्वासन देना

ऋष्यश्रंग थे अति मेधावी, वेदों के ज्ञाता भी थे
ध्यान लगाया कुछ पल को, हुए विरत राजा से बोले

मैं पुत्रेष्टि यज्ञ करूंगा, अथर्व वेद के मंत्रों द्वारा  
हो अनुष्ठान यदि विधिपूर्वक, सफल अवश्य ही होगा

यह कहकर तेजस्वी मुनि ने, आरम्भ की यज्ञ विधि
श्रौत विधि के अनुसार तब, अग्नि में दी थी आहुति

अपना भाग ग्रहण करने हित, उस यज्ञ में प्रगट हुए
 देव, सिद्ध, गन्धर्व, महर्षि, ब्रह्मा जी से ये बोले

रावण कष्ट हमें देता है, कृपाप्रसाद आपका पाकर
उसे दबा दें नहीं है शक्ति, करें आपके वर का आदर  

तीनों लोकों को दुःख देता, द्वेष उच्च जनों से करता
इंद्र को भी करे परास्त, इसकी वह अभिलाषा रखता

वरदान से मोहित होकर, उद्दंड वह, दुःख दे रहा  
ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वों, व ब्राह्मणों का अपमान कर रहा

सूर्य नहीं तपाता उसको, वायु भी न चले जोर से
सागर देख उसे न हिलता, थम जाती हैं उसकी लहरें

बड़ा भयंकर रूप है उसका, भयभीत हैं हम सब सारे
अति शीघ्र ही उसके वध का, कोई उपाय शीघ्र निकालें

8 comments:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना शुकरवार यानी 11/01/2013 को

    http://nayi-purani-halchal.blogspot.com पर लिंक की जाएगी…
    इस संदर्भ में आप के सुझाव का स्वागत है।

    सूचनार्थ,

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    1. कुलदीप जी, बहुत-बहुत आभार !

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    1. संगीता जी, स्वागत व आभार !

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  3. abhaar anita ji.. aaj bahut dinon baad yahaan aayi hoon ....

    aa kar lag rhaa hai ki kitna miss kar diya ... :(

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    1. शिल्पा जी, आते रहिये..स्वागत है

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  4. वाह बहुत खूब

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  5. अनु जी, आभार !

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