श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
एकत्रिंश: सर्ग:
रावण का अकम्पन की सलाह से
सीता का अपहरण करने के लिए जाना और
मारीच के कहने से लंका को लौट आना
देव-असुर दोनों मिलकर भी, उन्हें कभी हरा नहीं सकते
बहुत ध्यान देकर अब सुनिए, जिस उपाय से वे मर सकते
सीता हैं श्रीराम की पत्नी, जग की सर्वोत्तम सुंदरी
युवा, सुडौल अंग हैं उनके, आभूषणों से सजी रहतीं
स्त्रियों में रत्न हैं सीता, कोई भी नहीं बराबर उनके
देव, गंधर्व, नाग कन्या, अप्सरा भी समान नहीं उनके
सीता का करें आप अपहरण, किसी तरह राम को छलकर
जीवित नहीं रहेंगे श्रीराम, सीता से बिछुड़ जाने पर
बात पसंद आयी रावण को, उसने यह अकम्पन से कहा
प्रातः ही सारथि संग जाकर, सीता को लाऊँगा यहाँ
ऐसा कहकर गधों से जुते, तेजस्वी रथ पर सवार हो
रावण ने प्रस्थान किया था, कर प्रकाशित सब दिशाओं को
नक्षत्रों के मार्ग पर चलता, चन्द्र समान सुशोभित होता
ढका हुआ बादलों के मध्य, रावण का रथ जहाँ विचरता
एक आश्रम में जाकर वह, ताड़का पुत्र मारीच से मिला
भक्ष्य भोज्य अर्पित कर उसने, रावण का शुभ सत्कार किया
आसन व जल आदि देकर, करके पूजन उसका हाल लिया
कुशल तो है राज्य में तुम्हारे, मन में लगा है कुछ खटका
बड़ी उतावली से आये हो, लगता है, सब ठीक नहीं
मारीच के प्रश्नों को सुनकर, रावण ने यह बात कही
अनायास ही श्रीराम ने, मार गिराये दोनों खर-दूषण
सीमा की रक्षा जो करते, जनस्थान के मारे राक्षस
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