Thursday, May 21, 2026

खर का श्रीराम आदि के वध के लिये चौदह राक्षसों को भेजना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


एकोनविंश: सर्ग:



शूर्पणखा के मुख से उसकी दुर्दशा का वृत्तांत

सुनकर क्रोध में भरे हुए खर का 

श्रीराम आदि के वध के लिये चौदह राक्षसों को भेजना 


अंगहीन व रक्त से भीगी, भूमि पर जो पड़ी हुई थी 

देख बहन को भरा क्रोध से, खर ने उससे बात यह पूछी 


उठो बहन, मूर्छा त्यागो, स्पष्ट कहो, यह किया है किसने 

किसने किया आक्रमण तुम पर, रूपहीन बनाया किसने 


अंगुलियों के अग्र भाग से, कौन खेलता है विषधर से 

उसने विष पी लिया समझ लो, मोहवश अनभिज्ञ है इससे 


तुम तो स्वयं यम समान हो, अन्य प्राणी तुमसे डरते हैं 

इच्छानुसार रूप बदलती, यह अवस्था कहो की किसने 


देवों, गन्धर्वों, भूतों में, कौन शक्तिशाली ऋषियों में 

जिसने तुमको कष्ट दिया है, कौन भला ऐसा है जग में 


इंद्र भी ऐसा साहस कर लें, दिखायी पड़ता नहीं मुझे

प्राणान्तकारी मेरे बाण, प्राण हरेंगे अपराधी के 


छिन्न-भिन्न हो गये किसके, मर्मस्थान मेरे बाणों से 

गरम रक्त पीना चाहती है, यह वसुंधरा किस पुरुष के 


मेरे द्वारा मारे गये किस, व्यक्ति के शरीर का मांस 

झुंड के झुंड पक्षी खायेंगे, केवल मुझे बताओ नाम 


जिसे महासमर में खींचूँ , देवता भी नहीं बचा सकते 

गंधर्व, पिशाच, राक्षस भी, उसकी रक्षा नहीं कर सकते

 

खर के क्रोधित वचन सुने जब, शूर्पणखा ने उसे बताया 

वन में दो तरुण आये हैं , पिता हैं जिनके दशरथ राजा 


सुकुमार और बहुत बलवान हैं, वल्कल व मृगचर्म धारे 

कमल समान नयन हैं सुंदर, राम,लक्ष्मण नाम हैं उनके 


फल-मूल उनका भोजन है, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं 

गन्धर्वों समान लगते हैं, आपस में भाई-भाई हैं  


दानव या देव हैं दोनों, इसका मुझको भान नहीं है 

राजोचित लक्षण से संपन्न, उनके साथ एक युवती है 


रूपवती उस तरुणी स्त्री का, मध्यभाग अतीव सुंदर है 

आभूषणों से विभूषित, उसके कारण यह दशा हुई है 


एक अनाथ, कुलटा की भाँति, उन्होंने की मेरी दुर्दशा

 रक्त पान करना मैं चाहूँ, दो भाइयों और उस स्त्री का 


यह मेरी पहली प्रमुख इच्छा है, पूर्ण करो, हूँ अति व्यथित 

 शूर्पणखा के यह कहने पर,  होकर खर ने अत्यंत कुपित


चौदह राक्षसों को यही कहा, यम समान भयंकर थे जो 

दण्डकारण्य के भीतर जाकर, दो पुरुषों व स्त्री को मारो 


उन तीनों दुष्टों का रक्त, पीना चाहती है मेरी बहन

शीघ्र पूर्ण करो यह मनोरथ, उससे इसका होगा रंजन 


खर की आज्ञा पाकर, हवा से उड़ाये मेघों के जैसे  

पंचवटी की दिशा की तरफ़, शूर्पणखा के साथ वे गये 



 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।

 

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