Sunday, May 17, 2026

राम के आश्रम में शूर्पणखा का आना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

सप्तदश: सर्ग:


राम के आश्रम में शूर्पणखा का आना,

उनका परिचय जानना और अपना परिचय देकर

उनसे अपने को भार्या के रूप में

ग्रहण करने के लिए अनुरोध करना 



 सीता-रामचन्द्र और लक्ष्मण, पुन: आश्रम लौट आये फिर

 पूर्वाह्न का पूजन करके, पर्णशाला में बैठे आकर 


इसी प्रकार निवास करते थे, सुखपूर्वक सीता के साथ 

बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी आकर, किया करते उनका सत्कार 


चित्रा के संग ज्यों चंद्रमा, ऐसे ही शोभा पाते थे 

लक्ष्मण के संग बैठे राम, तरह-तरह की वार्ता करते 


एक बार जब इसी प्रकार, किसी चर्चा में लीन थे राम  

आ पहुँची थी बहन रावण की, शूर्पणखा था उसका नाम 

 

देवताओं के सम राम का, मनहर रूप निहारा उसने 

मुख तेजस्वी, बड़ी भुजाएँ, नेत्र कमल समान सुंदर थे 


हस्ति समान चाल थी उनकी, जटामण्डल युक्त था मस्तक

परम सुकुमार, महा बलशाली, राजोचित लक्षण से युक्त 


नीलकमल के समान कांति, सौंदर्य कामदेव जैसा था

इंद्र समान तेजस्वी राम, देख राक्षसी को मोह हुआ 


श्रीराम का मुख सुंदर था, शूर्पणखा का भद्दा व कुरूप 

मध्यभाग सुंदर राम का, था उसका दीर्घ उदर बेडौल


श्रीराम के नयन थे सुंदर, उसकी अति डरावने आँखें 

केश राम के कोमल, सुंदर, ताम्र वर्णीय कुंतल उसके 


रूप अति प्यारा राम का, शूर्पणखा का वीभत्स, विकराल 

बहुत मधुर वाणी राम की, कर्कश कठोर थे उसके बोल 


राम सौम्य और नित तरुण थे, वह हज़ारों वर्ष की वृद्धा 

सरल और उदार थे राम, उसकी बातों में थी कुटिलता 


सदाचार का पालन करते, न्यायोचित थे कृत्य राम के 

शूर्पणखा थी दुराचारिणी, वितृष्णा होती जो देखते 


कामभाव से हुई आविष्ट, निकट वह आयी श्रीराम के

क्यों आये यहाँ? मुझे कहो, धनुष लिए तापस के वेश में


इस प्रकार जब उसने पूछा, राम ने बताना शुरू किया 

अपने सरल स्वभाव के कारण, कुछ भी नहीं अन्यथा लिया

 

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