श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
राम के आश्रम में शूर्पणखा का आना, उनका परिचय जानना और अपना परिचय देकर उनसे अपने को भार्या के रूप में ग्रहण करने के लिए अनुरोध करना
देवी ! मैं दशरथ का पुत्र हूँ, जो थे चक्रवर्ती सम्राट
साथ हैं मेरे भाई लक्ष्मण, राम नाम से मैं विख्यात
विदेहराज जनक की पुत्री, यह मेरी पत्नी सीता हैं
माता-पिता की आज्ञा से हम, वनवास करने आये हैं
तुम किसकी पुत्री हो? देवी, क्या नाम मिला, किसकी पत्नी
राक्षसी जान पड़ती हो, रूप इच्छानुसार धार सकती
सही-सही बातें बताओ, किस कारण तुम यहाँ आयी हो
शूर्पणखा है मेरा नाम, बोली, वह काम से पीड़ित हो
भय पैदा करती मनों में, किया करती हूँ वन में विचरण
संभव है तुमने सुना हो, नाम मेरे भाई का रावण
विश्रवा का वीर पुत्र है, दूसरा भाई है कुंभकर्ण
जिसकी निद्रा सदा बढ़ती है, तीसरे का नाम विभीषण
राक्षसों सरिस नहीं आचार, विभीषण बहुत धर्मात्मा है
खर-दूषण भी भ्राता मेरे, युद्ध में पराक्रम जिनका है,
बल में भाइयों से बढ़ हूँ, नहीं है कोई मेरे समान
मन आसक्त हुआ है मेरा, पाकर तुम्हारा प्रथम दर्शन
तुम जैसे पुरुषोत्तम के प्रति, भावना लिए आयी पति की
संपन्न हूँ मैं प्रभाव से, हर लोक में विचरण कर सकती
दीर्घकाल के लिए, इसलिए, स्वामी बन जाओ तुम मेरे
इस अबला सीता को लेकर, जीवन में तुम क्या कर लोगे
विकार युक्त है और कुरूपा, अत: यह तुम्हारे योग्य नहीं
मैं केवल अनुरूप तुम्हारे, बना लो भार्या मुझे अपनी
सीता कुरूप मेरी दृष्टि में, है धँसे हुए उदर वाली
यह तुम्हारे भाई के साथ, अब मेरा आहार बनेगी
फिर तुम कामभाव से जुड़कर, दंडक वन में विचरण करना
सुन कर शूर्पणखा की बात, आरंभ किया राम ने हँसना
मतवाले नेत्रों वाली उस, निशाचरी से ये वचन कहे
ककुत्स्थकुलभूषण रामचंद्र, बातचीत में बहुत कुशल थे
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के
अरण्यकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ।
बहुत बढ़िया
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