Monday, April 11, 2016

श्रीराम का उन्हें समझाना तथा राजा का श्रीराम को हृदय से लगाकर पुनः मूर्छित हो जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

चतुस्त्रिंशः सर्गः

सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिए विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा, श्रीराम का उन्हें समझाना तथा राजा का श्रीराम को हृदय से लगाकर पुनः मूर्छित हो जाना 


मुक्त विघ्न और बाधा से, मार्ग तुम्हारा हो निर्भय
असम्भव है तुम्हें रोकना, धर्म स्वरूप तुम्हारा सत्य

किन्तु रात भर रह जाओ, माँ व मेरी हालत जान
दर्शन का सुख पालूं जिससे, एक रात रोको प्रस्थान

प्रातः काल चले जाना तुम, तृप्त हुए वस्तु से इच्छित
दुष्कर कार्य कर रहे हो तुम, मेरा प्रिय करने की खातिर

किंतु शपथ खाकर मैं कहता, नहीं प्रिय वनवास तुम्हारा
छिपी राख में आग की भांति, कैकेयी का अभिप्राय क्रूर था  

विचलित किया इसीने उससे, जो अभीष्ट संकल्प था मेरा
प्रेरित कर वरदान के हेतु, मेरे साथ किया है धोखा

कुलोचित जो सदाचार है, इसने उसका नाश किया
जो वंचना इससे पायी, तुम चाहो पार उसी को करना

पिता को सत्यवादी बनाना, यही चाहते हो तुम श्रेष्ठ
नहीं कोई अचरज है इसमें, गुण, आयु दोनों में ज्येष्ठ  

शोकाकुल पिता को सुनकर, कहा राम ने पीड़ा से
महाराज ! जो कुछ पाऊँगा, आज, मिलेगा कल कैसे

अच्छा होगा आज ही निकलूँ, सब कामनाओं के बदले
त्यागा इसे भारत के दे दें, सम्पन्न राष्ट्र धन-धान्य से

निश्चय नहीं बदल सकता अब, वरदायक श्रेष्ठ नरेश हे
देवासुर संग्राम में जो वर, दिए, उन्हें अब पूर्ण करें  

कर पालन आज्ञा का आपकी, चौदह वर्ष रहूँगा वन में
नहीं कोई अन्यथा विचार, आप लायें अपने मन में

निज अथवा स्वजनों के सुख हित, इच्छा मुझे नहीं राज्य की
मान आपकी आज्ञा ही तो, ग्रहण की इसके अभिलाषा की

पीड़ा दूर आपकी हो, अश्रु नहीं बहायें आप
सागर नहीं क्षुब्ध होता है, करें न मर्यादा का त्याग

मुझे न इच्छा राज्य या सुख की, भोगों की या पृथ्वी की
स्वर्ग भी इच्छित नहीं है मुझको, न ही इच्छा है जीवन की

एक ही इच्छा मेरे मन में, बनें आप सत्यवादी
वचन न मिथ्या हो आपका, शपथ सत्य व शुभ कर्मों की  

पल भर भी न रुक सकता अब, दुःख को भीतर ही दबा लें
कैकेयी को वचन दिया था, जाता उसको पालन करने

हमें देखने या मिलने हित, उत्कंठित आप न होवें
आनन्द से हम रहेंगे, शांत मृगों से भरे अरण्य में

देवों के भी देव पिता, जाता देव आपको जान   
दुःख छोड़ें, मुझे देखंगे, चौदह वर्ष का हो अवसान

अश्रु बहाते कितने लोग, धैर्य बंधाएँ आप इन्हें
कर्तव्य अपना भुला क्यों, स्वयं ही इतने विकल हो रहे  

नगर, राज्य या सारी पृथ्वी, छोड़ी आप भरत को दें
वचन आपका होगा पूर्ण, जाता हेतु वनवास के

आपकी आज्ञा के पालन में, मेरा मन जैसा लगता है
प्रिय पदार्थ में भी न लगता, लगता नहीं वैसा भोगों में

मेरे लिए जो दुःख आपको, दूर उसे अब हो जाने दें
नहीं चाहिए भोग कोई यदि, मिथ्यावादी आप कहाएं  

फल-मूल का भोजन करता, देख के नदियों, पर्वतों को
सुखी रहूँगा वन में मैं, शांत करें आप भी मन को

श्रीराम के यह कहने पर, पुत्र-विछोह के संकट में खो
राजा ने उर से लगाया, गिरे भूमि पर वे अचेत हो

जड़ की भांति हुआ शरीर, देख सभी रानियाँ रो दीं
मुर्छित हुए सुमन्त्र भी रोकर, हाहाकार मचा चहुँ ओर !

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ.

  

Friday, April 8, 2016

सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिए विदा माँगना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

चतुस्त्रिंशः सर्गः

सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिए विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा, श्रीराम का उन्हें समझाना तथा राजा का श्रीराम को हृदय से लगाकर पुनः मूर्छित हो जाना  

कमल नयन श्रीराम ने जब, सूत सुमन्त्र से कहे ये वचन
शीघ्र गये सुमन्त्र भीतर तब, करने दुखी राजा के दर्शन

लम्बी श्वासें खींच रहे थे, इन्द्रियां थीं कलुषित पीड़ा से
राहु ग्रस्त सूर्य की भांति, आग ढकी हो ज्यों राख से

जलशून्य तालाब समान, श्री विहीन लगते थे राजा
श्रीराम का चिन्तन करते, चित्त अति व्याकुल था उनका  

महाप्राज्ञ सूत ने उनसे, हाथ जोड़कर की विनती
पहले आशीर्वाद भी दिया, अभ्युदय की कामना की

भय से व्याकुल मधुर शब्द तब, राजा दशरथ से बोले
सारा धन दान में देकर, मिलने आये पुत्र आपके

लेकर विदा अपने मित्रों से, दर्शन आपके करने आये
आज्ञा हो तो आयें यहाँ, इसके बाद वे वन जाएँ

राजोचित गुणों से सम्पन्न, सूर्य समान राम को देखें
नभ से निर्मल सिंधु गंभीर, यह सुनकर राजा बोले

यहाँ बुलाओं रानियों को भी, उनके संग उन्हें देखूंगा
तब सुमन्त्र ने बड़े वेग से, अंतः पुर में दी सूचना

स्वामी का आदेश मानकर, सब रानियाँ तब चल दीं
कौसल्या को घेर सभी वे, धीरे-धीरे आ पहुंची

अब मेरे पुत्र को लाओ, कहा सुमन्त्र से तब राजा ने
देख दूर से ही राम को, अपने आसन से दौड़े

घिरे हुए रानियों से वे, दुःख से अति ही पीड़ित थे  
पृथ्वी पर गिर पड़े विकल, हुए मूर्छित वे दुःख से

राम-लक्ष्मण तेजी से चल, पहुंचे उन राजा के पास
इतने में ही राजभवन में, गूँज उठा था आर्तनाद

आभूषण की ध्वनि के मध्य, हा राम ! की गूँज उठी
सुनकर रुदन रो पड़े स्वयं, राम-लक्ष्मण व सीता भी

बिठा दिया पलंग पर मिलकर, महाराज को तीनों ने
हाथ जोड़कर राम ने कहा, चेत हुआ जब दो घड़ी में

स्वामी हैं प्रभु आप हमारे, तत्पर मैं वन जाने को
कृपा दृष्टि से देखें मुझे व, सीता सहित लक्ष्मण को  

रोकना चाहा मैंने इनको, किन्तु यहाँ न रहना चाहें
वन जाने की दें आज्ञा, शोक त्याग कर आप हमें

ब्रहाजी ने ज्यों पुत्रों को, तप हेतु दी थी आज्ञा
शांत भाव से प्रतीक्षा करते, राजा ने राम से कहा

मोह में पड़ा बंधा हूँ मैं, कैकेयी के वर के कारण
मुझको कर लो कैद और, स्वयं राजा तुम जाओ बन

बातचीत में कुशल राम ने, हाथ जोड़कर कहे वचन
बनें रहें अधिपति पृथ्वी के, करूँगा मैं वन को ही गमन

चौदह वर्षों तक भ्रमण कर, पूर्ण प्रतिज्ञा कर आऊँगा
पुनः युगल चरणों में आपके, निज मस्तक झुकाऊँगा

सत्य के दृढ़ बंधन में, थे राजा दशरथ बंधे हुए
वन को जाएँ राम तुरंत, कैकेयी कर रही थी बाध्य

आर्तभाव से वे तब बोले, प्रिय पुत्र राम से, जाओ !
वृद्धि व कल्याण के हित तुम, पुनः लौट आने हित जाओ



Wednesday, April 6, 2016

श्रीराम का दुखी नगरवासियों के मुख से तरह-तरह की बातें सुनते हुए पिता के दर्शन के लिए कैकेयी के महल में जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

त्रयस्त्रिंशः सर्गः
सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का दुखी नगरवासियों के मुख से तरह-तरह की बातें सुनते हुए पिता के दर्शन के लिए कैकेयी के महल में जाना

संग सीता के राम, लक्ष्मण, वन जाने को हो तैयार
गये पिता का दर्शन करने, दान ब्राह्मणों को देकर

उनके साथ चले दो सेवक, लेकर धनुष पुष्प से सज्जित
सीता ने जिनकी पूजा कर, चन्दन से था किया अलंकृत 

उस अवसर पर धनी लोग, खड़े देखते थे छतों से
तिमंजिले व सात मंजिले, ऊँचे अति राजभवनों से

भरी भीड़ से थीं सब सडकें, चलना कठिन हुआ उन पर
देख रहे थे जन छतों से, श्रीराम को दुख से भर कर

व्याकुल हुए शोक से कहते, पैदल जाते देख उन्हें
सेना चलती पीछे जिनके, आज अकेले चले जा रहे

ऐश्वर्य में सदा पले थे, पूर्ण कामना सबकी करते
धर्म का गौरव रखने हेतु, पितृ वचन को पूरा करते 

देख नहीं पाते थे जिनको, नभ में उड़ने वाले प्राणी
खड़े सड़क पर लोग देखते, पैदल चलतीं जनक नंदिनी

अंगराग, चन्दन से सेवित, कैसे वर्षा, शीत सहेंगी
ग्रीष्म आदि ऋतुएं अब इनकी, अंग कांति फीकी कर देंगी

निश्चय ही हुए आवेशित, राजा दशरथ किसी पिशाच से
निष्कासित करे प्रिय पुत्र को, कौन अपने सहज रूप में

गुणहीन भी हो यदि पुत्र, साहस नहीं निकाल दे घर से
जग मोहित है शील से जिसके, वनवास उसको दें कैसे

शम, दम, शील, दया, विद्या, और क्रूरता का अभाव है
छह सद्गुणों से राम सुशोभित, सुंदर अति पाया स्वभाव है

राज्याभिषेक नहीं होने से, प्रजा को भारी क्लेश हुआ
जीव तड़पते ज्यों सरवर में, ग्रीष्म ऋतु में जो सूखा

इन जगदीश्वर श्रीराम की, पीड़ा से जग व्यथित हुआ
जैसे जड़ें काट देने से, पुष्प सहित वृक्ष हो सूखा

ये महान तेजस्वी राम, मूल सभी मानवों के हैं
धर्म ही इनका बल है उत्तम, दूजे प्राणी शाखाएँ हैं

अतः लक्ष्मण की भांति हम, इनके पीछे-पीछे चल दें
जिस मार्ग से यह जाते हैं, उसका ही अनुसरण करें

बाग-बगीचे, घर-द्वार सब, छोड़ के चल दें इनके पीछे
गड़ी हुई निधि निकाल कर, सुख-दुःख के साथी हो लें

फर्श खोद डालें घरों के, धन-धान्य साथ ले लें
धूल भरे निवासों में इन, देवता भी इन्हें त्याग दें

चूहे निकल बिलों से दौड़ें, अग्नि जले न इन घरों में
झाड़ू भी न लगे यहाँ पर, यज्ञ, मन्त्र, होम न होवे  

बड़ा भारी अकाल पड़ जाए, ढह जाएँ ये घर सारे
टूटे बर्तन यहाँ पड़े हों, सदा के लिए इन्हें त्याग दें

ऐसी दशा में ही कैकेयी, आकर इन पर अधिकार करे
राम का वन ही बने नगर, नगर यह जंगल बन जाये

वन में हमलोगों के भय से, सांप छोड़ जाएँ अपने बिल
शिखरों को त्याग दें सारे, पर्वत के मृग व पक्षी गण

हाथी व सिंह उस वन को, त्याग दूर निकल जाएँ
यहाँ रहें आकर वे सारे, कैकेयी तब इसे सम्भाले

किन्तु विकार जगा न कोई, सुनीं राम ने ये सब बातें
मतवाले गजराज की भांति, वे तीनों महल में गये

दुखी सुमन्त्र वहाँ खड़े थे, अन्य कई अवध वासी भी
किन्तु सहज हो राम बढ़े, थी इच्छा पिता दर्शन की

दें सूचना महाराज को, कहा सुमन्त्र से यह राम ने
पिता की आज्ञा को मानकर, वन जाने का निश्चय करके


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ.