Wednesday, July 25, 2012

राजा दशरथ द्वारा सुरक्षित अयोध्यापुरी का वर्णन


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 


पञ्चमः सर्गः

राजा दशरथ द्वारा सुरक्षित अयोध्यापुरी का वर्णन 


बड़े बड़े फाटक थे उसमें, पृथक-पृथक बाजार थे
सभी कलाओं के शिल्पी थे, अस्त्र-शस्त्र व यंत्र थे

स्तुति पाठ सूत करते थे, वंशावली सुनाते मागध
अतुलनीय सुषमा थी उसकी, ऊँचे भवनों पर थे ध्वज

 उद्यानों, उपवन से सज्जित, शतघ्नियों से रक्षित थी
साखू के वन घेर रहे थे, लंबी-चौड़ी अति विशाल थी

चारों ओर खुदी थी खाई, जिसे लांघना था दुर्गम
शत्रु के हित अति दुर्जय थी, उपयोगी पशुओं से पूर्ण

कर दाता नरेश आते थे, व्यापारी भी भिन्न देश के
स्त्रियों की नाटक मंडली, दिखलाती अभिनय नृत्य के

रत्नों से वे महल बने थे, पर्वत सम ऊँचे थे भवन
कूटागारों से परिपूर्ण, अमरावती सी होती शोभन
बड़ी विचित्र थी शोभा उसकी, महलों पर था जल स्वर्णिम
सतमहला प्रासाद थे उसमें, सुंदर नारियों से शोभित

आबादी भी घनी वहाँ की, समतल भूमि पर बसी थी
ईख समान मधुर जल वाली, धान के खेतों से भरी थी

भूमंडल पर सर्वोत्तम थी, मृदंग, वीणा वाद्य गूंजते
दुन्दुभी, पणव बजते थे, मानो सिद्धों के विमान थे

श्रेष्ठ पुरुष निवास करते थे, भीतर से भी घर सुंदर
दशरथ द्वारा थी पालित,  महारथी वीरों से सम्पन्न

जो अनाथ हो, भाग रहा हो, उन पर वार नहीं करते
लक्ष्य वेध करने में सक्षम, कुशल अस्त्र-शस्त्र चालन में

क्रमशः





Friday, July 20, 2012

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्


पञ्चमः सर्गः

राजा दशरथ द्वारा सुरक्षित अयोध्यापुरी का वर्णन


कोशल नामका एक है जनपद, सरयू नदी के तट पर बसा
धन-धान्य से सम्पन्न सुखी, समृद्धिशाली, विशाल, बड़ा

उसी जनपद में नगरी एक, अयोध्या नाम से जग विख्यात
मनु महाराज ने जिसे बनवाया, बसाया था अपने ही हाथ

बारह योजन लंबी थी वह, चौड़ाई थी तीन योजन की
अन्य मार्गों से विभक्त था, राजमार्ग पर वृक्षावलियाँ थीं

पुरी की शोभा बढ़ी थी उससे, राजमार्ग पर बिछे थे पुष्प
विभाग पूर्वक बना था सुंदर, प्रतिदिन होता जल छिड़काव  

ज्यों इंद्र की अमरावती है, वैसे नृप दशरथ ने बसाई
धर्म, न्याय के बल से अपने, वृद्धि की थी महान राष्ट्र की



Friday, July 13, 2012

राजा दशरथ द्वारा सुरक्षित अयोध्यापुरी का वर्णन


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्


चतुर्थ सर्ग

महर्षि वाल्मीकि का चौबीस हजार श्लोकों से युक्त रामायण काव्य का निर्माण करके उसे लव-कुश को पढाना, मुनिमंडली में रामायण गान करके लव और कुश का प्रशंसित होना तथा अयोध्या में श्रीराम द्वारा सम्मानित हो उन दोनों का राम दरबार में रामायण गान सुनाना 

मंत्री व भाई भी वहीं थे, लवकुश का सम्मान किया
सुंदर रूपवान दोनों ने, मधुर काव्य का गान किया

सँग वीणा की लय के गाते, उच्च स्वर में राग अलापें
स्पष्ट बहुत था उच्चारण भी, सुन श्रोता हर्षित हो जावें

सुखद बहुत है इनका गायन, राम भाइयों को पुनः कहते
मुनि कुमार हैं दोनों तापस, कितनी मधुर रीति से गाते

मार्ग विधान का ले आश्रय, दोनों गाते थे रामायण
मगन हो गए राम सभा में, धीरे-धीरे सुन वह गायन

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बाल्काण्डे चतुर्थः सर्गः

पञ्चमः सर्गः

राजा दशरथ द्वारा सुरक्षित अयोध्यापुरी का वर्णन

प्रजापति मनु से लेकर, यह सारी पृथ्वी पूर्वकाल में
रहती आयी अधिकार में, राजाओं के जिस वंश में

जिन्होंने सागर को खुदवाया, साठ हजार पुत्र थे जिनके
उसी इक्ष्वाकुवंश की गाथा, महाप्रतापी सगर जिस कुल में

आदि से अंत तक हम दो, इस काव्य का गान करेंगे
दोष दृष्टि त्याग कर सुनिए, इससे चारों पुरुषार्थ सधेंगे

क्रमशः

Monday, July 9, 2012

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम् चतुर्थ सर्ग


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

चतुर्थ सर्ग

महर्षि वाल्मीकि का चौबीस हजार श्लोकों से युक्त रामायण काव्य का निर्माण करके उसे लव-कुश को पढाना, मुनिमंडली में रामायण गान करके लव और कुश का प्रशंसित होना तथा अयोध्या में श्रीराम द्वारा सम्मानित हो उन दोनों का राम दरबार में रामायण गान सुनाना

 इस प्रकार की अति प्रशंसा, हर्षित होकर महर्षियों ने
पाकर कई पुरस्कार वे, मधुर राग से गायन करते

दिया किसी ने कलश, वल्कल वस्त्र भी भेंट दिया 
मृगचर्म करे अर्पित कोई, यज्ञोपवीत प्रदान किया

एक कमंडल दे हो हर्षित, मुंज मेखला दी दूजे ने
आसन दिया एक मुनि ने, कौपीन भी दिया चौथे ने

कुठार, गेरुआ वस्त्र भी मिला, जटा बांधने की रस्सी दी
चीर भेंट में मिला उन्हें, समिधा हेतु भी डोरी दी

यज्ञ पात्र दिया हर्ष में, काष्ठभार भी किया समर्पित
गूलर की लकड़ी का पीढ़ा, ढेरों आशीषें की अर्पित

कल्याण हो तुम दोनों का, आयुष भी हो दीर्घ तुम्हारी
इस प्रकार अनेक मुनियों ने, शुभकामनाएँ  दे डाली
आश्चर्य मय काव्य यह अनुपम, कथा सुनाता है राम की
परवर्ती कवियों के हेतु, है आधारशिला काव्य की

मधुर स्वर से गाने वाले, काव्य मधुर पुष्टि देता है
राजकुमारों हो कुशल तुम, कर्ण और मन को मोहता है

एक बार वे गए अयोध्या, गलियों, सड़कों पर गाते थे
भरत के भाई राम ने देखा, सदा प्रशंसा जो पाते थे

घर बुलाया बन्धु जनों को, समुचित आदर-मान दिया
तत्पश्चात गए सभा में, सुवर्ण सिहांसन ग्रहण किया
 क्रमशः

Monday, July 2, 2012

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम् चतुर्थ सर्ग


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम्
 



चतुर्थ सर्ग

महर्षि वाल्मीकि का चौबीस हजार श्लोकों से युक्त रामायण काव्य का निर्माण करके उसे लव-कुश को पढाना, मुनिमंडली में रामायण गान करके लव और कुश का प्रशंसित होना तथा अयोध्या में श्रीराम द्वारा सम्मानित हो उन दोनों का राम दरबार में रामायण गान सुनाना 


मुनि ने देखा उनकी ओर, थे सुयोग्य वे, मन में जाना
सीता के चरित्र से युक्त, आरम्भ किया काव्य पढ़ाना

‘पौलस्त्य वध’ रखा था, उसका अन्य नाम विचार   
उत्तम व्रती मुनि थे वे, वेदार्थ का किया विस्तार

पाठ-गान में मधुर काव्य यह, द्रुत, मध्य, विलम्बित भी है
सप्त स्वरों से युक्त हुआ है, सँग वीणा के गा सकते हैं

श्रृगार, करूण, हास्य, रौद्र, भयानक रस से अनुप्राणित
महाकाव्य पढ़ करते गान, लव-कुश दोनों हो हर्षित

संगीत-शास्त्र के तत्वज्ञ, गन्धर्वों सम रूप था शोभन
स्थान व मूर्छना के ज्ञाता, मधुर स्वर से थे सम्पन्न

सुंदर रूप, शुभ लक्षण, उनकी सहज सम्पत्ति थे
दूजे युगल राम ही लगते, वार्तालाप मधुर करते थे

सबकी प्रशंसा के पात्र, जिह्वाग्र किया सम्पूर्ण काव्य
ऋषियों, साधुओं के समागम में, गाते थे रामायण काव्य

एक दिन महर्षि-मंडली में, गान किया मिल दोनों ने
हो हर्षित मुनि वे बोले, है अति माधुर्य इस गान में

यह घटनाएँ पहले हुई थीं, लगती हैं प्रत्यक्ष हो रहीं
सुंदर भाव, राग युक्त गायन, श्लोकों में मधुरता भी




Wednesday, June 20, 2012

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम् चतुर्थ सर्ग


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 


चतुर्थ सर्ग

महर्षि वाल्मीकि का चौबीस हजार श्लोकों से युक्त रामायण काव्य का निर्माण करके उसे लव-कुश को पढाना, मुनिमंडली में रामायण गान करके लव और कुश का प्रशंसित होना तथा अयोध्या में श्रीराम द्वारा सम्मानित हो उन दोनों का राम दरबार में रामायण गान सुनाना

वन से लौट लिया राम ने, शासन जब अपने हाथों में
उनके चरित्र पर आधारित, रचा काव्य कवि वाल्मीकि ने

चौबीस हजार श्लोक थे जिसमें, सर्ग पांच सौ, सात कांड
विचित्र अर्थ व पद युक्त था, शामिल उत्तर व भविष्य कांड

ज्ञानी कवि ने किया विचार तब, कौन शक्तिशाली होगा
महाकाव्य को सुना सके जो, ऐसा नर कौन होगा

शुद्द अन्तकरण था जिनका, महर्षि ने जब किया विचार
चरणों में आकर झुक गए तब, लव-कुश दोनों राजकुमार

दोनों थे धर्म के ज्ञाता, स्वर था मधुर, यशस्वी थे
धारणा शक्ति अद्भुत थी उनकी, वेदों में पारंगत थे

Tuesday, June 12, 2012

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम् तृतीयः सर्गः


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम्


तृतीयः सर्गः
वाल्मीकि मुनि द्वारा रामायण काव्य में निबद्ध विषयों का संक्षेप से उल्लेख 

सुग्रीव हित क्रोध राम का, वानर सेना का संग्रह
सुग्रीव का सेना भेजना, देना स्थानों का परिचय

सीता के विश्वास हेतु, हनुमान को देना अंगूठी
स्वयंप्रभा गुफा का दर्शन, प्राणत्याग की इच्छा उनकी

सम्पाती से भेंट सेना की, महेंद्र पर्वत पर कपि का जाना
मैनाक का दर्शन उनको, हनुमान का समुद्र लांघना

सिहिंका का दर्शन व निधन, त्रिकुट पर्वत पर जाना
रात्रि समय लंका प्रवेश, विचार कर्त्तव्यों का करना

रावण के अंतःपुर जाना, रावण व पुष्पक का दर्शन
अशोक वाटिका में आकर, सीता जी का शुभ दर्शन

सीता को अंगूठी देना, राक्षसियों का क्रोध दिखाना
त्रिजटा का स्वप्न शुभकारी, सीता का चूड़ामणि देना

कपि का वृक्षों का तोड़ना, राक्षसियों का भागना
रावण के सेवकों का, हनुमान से मारा जाना

हनुमान का बंदी होना, गर्जन और दाह लंका का
लौटकर समुद्र लांघना, मधुबन में पान मधु का

सीता की चूड़ामणि देकर, आश्वासन राम को देना
सेना सँग सुग्रीव के साथ, नल द्वारा सेतु बांधना

सेतु द्वारा सागर पार, लंका पर चहुँ घेरा डालना
विभीषण सँग मैत्री सम्बन्ध, रावण वध का उपाय बताना

कुम्भकर्ण, मेघनाथ वध, रावण का विनाश भीषण
अभिषेक विभीषण का, पुष्पक विमान का अवलोकन

दल-बल सहित अयोध्या जाना, भरद्वाज मुनि से मिलना
हनुमान को दूत बना कर, भ्राता भरत के पास भेजना

वानर सेना की विदाई, राज्यभिषेक श्रीराम का
राष्ट्र को रखना प्रसन्न, प्रजा हित त्याग सीता का


इन सब वृतांतों को रचा, और जो कुछ भी भावी था
वाल्मीकि ने रचा काव्य में, उत्कृष्ट यह महाकाव्य था

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकिये आदिकाव्ये बाल कांडे तृतीयः सर्गः.